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उज्जयिनी का प्राचीन इतिहास

उज्जैन क्षिप्रा नदी के किनारे बसा मध्यप्रदेश का प्रमुख धार्मिक नगर है। यह ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का प्राचीन शहर है। महाराजा विक्रमादित्य के शासन काल में उनके राज्य की राजधानी उज्जैन थी। इसको कालिदास की नगरी भी कहा जाता है।

उज्जैन में हर 12 वर्ष के बाद ‘सिंहस्थ कुंभ‘ का मेला होता है। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक ‘महाकालेश्वर‘ इसी नगरी में है। मध्यप्रदेश के प्रसिद्ध नगर इंदौर से यह 55 कि.मी. की दूरी पर है।

उज्जैन के अन्य प्राचीन प्रचलित नाम हैं- ‘अवन्तिका‘, ‘उज्जयिनी‘, ‘कनकश्रन्गा‘ है। उज्जैन मंदिरों का नगर है। यहाँ अनेक तीर्थ स्थल है। इसकी जनसंख्या लगभग 4 से 5 लाख है।

उज्जैन का प्राचीन इतिहास काफी विस्तृत है। यहाँ के गढ़ क्षेत्र में हुई खुदाई में ऐतिहासिक एवं प्रारंभिक लौह युगीन सामग्री अत्यधिक मात्रा में प्राप्त हुई है। महाभारत व पुराणों में उल्लेख है कि भगवान कृष्ण व बलराम उज्जैन में गुरू संदीपनि के आश्रम में विद्या प्राप्त करने आये थे। कृष्ण की पत्नी मित्रवृन्दा उज्जैन की राजकुमारी थीं और उनके दो भाई ‘विन्द‘ एवं ‘अनुविन्द‘ ने महाभारत के युद्ध में कौरवों की तरफ से युद्ध किया था।

उज्जैन का एक अन्य अत्यंत प्रतापी राजा हुआ है, जिसका नाम चंडप्रद्योत था। भारत के अन्य राजा भी उससे डरते थे। ईसा की छठी सदी में वह उज्जैन का शासक था। उसकी पुत्री वासवदत्ता एवं वत्स राज्य के राजा उदयन की प्रेम कथा इतिहास में बहुत प्रसिद्ध है। बाद के समय में उज्जैन मगध साम्राज्य का अभिन्न अंग बन गया था।

कालीदास की प्रिय नगरी : उज्जयिनी के इतिहास प्रसिद्ध राजा विक्रमादित्य के दरबार के नवरत्नों में से महाकवि कालिदास प्रमुख थे। कालिदास की उज्जयिनी अत्यधिक प्रिय थी। इसी कारण से कालिदास ने अपने काव्य गं्रथों में उज्जयिनी का अत्याधिक मनोरम और सुंदर वर्णन किया है। महाकवि कालिदास सम्राट विक्रमादित्य के आश्रय में रहकर काव्य रचना किया करते थे। कालिदास ने उज्जयिनी में ही अधिकतर प्रवास किया और उज्जयिनी के प्राचीन एवं गौरवशाली वैभव को बढ़ते देखा। कालिदास की मालवा के प्रति गहरी आस्था थी। यहाँ रहकर महाकवि ने वैभवशाली ऐतिहासिक अट्टालिकाओं को देखा, उदयन और वासवदत्ता की प्रेमकथा की अत्यंत भावपूर्ण लिपिबद्ध किया। भगवान महाकालेश्वर की संख्या कालीन आरती को और क्षिप्रा नदी के पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व से भली-भाति परिचित होकर उसका अत्यंत मनोरम वर्णन किया, जो आज भी साहित्य जगत कि अमूल्य धरोहर है।

अपनी रचना ‘मेघदूत‘ में महाकवि कालिदास ने उज्जयिनी का बहुत ही सुंदर वर्णन करते हुए कहा कि - ‘‘जब स्वर्गीय जीवों को अपना पुण्य क्षीण हो जाने पर पृथ्वी पर आना पड़ा, तब उन्होंने विचार किया कि हम अपने साथ स्वर्ग भूमि का एक खंड (टुकड़ा) भी ले चलते है। वही स्वर्ग खंड उज्जयिनी है।‘‘

महाकवि ने लिखा है कि - उज्जयिनी भारत का वह प्रदेश है, जहाँ के वृद्धजन इतिहास प्रसिद्ध अधिपति राजा उदयन की प्रणय गाथा कहने में पूर्णतः प्रवीण है। कालिदास कृत ‘मेघदूत‘ में वर्णित उज्जयिनी का वैभव आज भले ही विलुप्त हो गया हो, परंतु आज भी विश्व में उज्जयिनी का धार्मिक, पौराणिक एवं ऐतिहासिक महत्व है।

साथ ही उज्जयिनी ज्योतिष के क्षेत्र में भी प्रसिद्ध है। सात पुराणों में वर्णित प्रसिद्ध नगरियों में उज्जयिनी प्रमुख स्थान रखती है। उज्जयिनी में प्रत्येक बारह वर्षो में सिंहस्थ कुम्भ महापर्व का आयोजन होता है। कुम्भ के पावन अवसर पर देश-विदेश से करोड़ों श्रद्धालु, भक्तजन, साधु-संत, महात्मा एवं अखाड़ों के मठाधीश प्रमुख रूप से उज्जयिनी में कल्पवास करके मोक्ष प्राप्ति की कामना करते है।

प्रमाणिक इतिहास : उज्जयिनी का प्रमाणिक इतिहास ई. सन 600 वर्ष के लगभग का मिलता है। तत्कालीन समय में भारत में सोलह महाजनपद थे। उनमें से अवंति जनपद भी एक था। अवंति जनपद उत्तर एवं दक्षिण दो भागों में विभक्त था। उत्तरी भाग की राजधानी उज्जयिनी थी तथा दक्षिण भाग की राजधानी ‘महिष्मति‘ थी। उस समय चंद्रप्रद्योत नाम का राजा सिंहासन पर था। इस प्रद्योत राजा के वंशजों का उज्जयिनी पर लगभग ईसा की तीसरी शताब्दी तक शासन रहा था।

मौर्य शासक : ‘भारतीय इतिहास‘ में प्रसिद्ध मौर्य काल का सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य भी यहाँ आया था और उसका पौत्र अशोक उज्जयिनी का राज्यपाल भी रहा था। उसकी एक पत्नी देवी से महेंद्र और ‘संघमित्रा‘ नामक पुत्र और पुत्री हुई थी, जिन्होंने श्रीलंका में बौद्ध धर्म का प्रचार व प्रसार किया था। मौर्य साम्राज्य के स्थापित होने पर मगध के सम्राट बिन्दुसार का पुत्र अशोक उज्जयिनी का शासक नियुक्त हुआ था। बिन्दुसार की मृत्यु के बाद अशोक ने उज्जयिनी का शासन प्रबंध अपने हाथों में सम्माला। यह उज्जयिनी के सर्वागीण विकास का समय था। सम्राट अशोक के बाद उज्जयिनी ने अनेकों सम्राटां का पतन और उत्थान देखा।

मौर्य साम्राज्य का पतन : मौर्य साम्राज्य के प्रसिद्ध शासक अशोक के बाद उज्जयिनी शकों और सातवाहनों की प्रतिस्पर्धा का मुख्य केन्द्र बन गई। शकों के पहले आक्रमण को उज्जयिनी के वीर शासक विक्रमादित्य ने प्रथम सदी ईसा पूर्व विफल कर दिया था, किन्तु कालांतर में विदेशों शकों ने उज्जयिनी पर अपना अधिकार कर लिया। चस्टन व रूद्रदामन शक वंश के प्रतापों व लोकप्रिय महाक्षत्रप हुए थे।

गुप्त साम्राज्य : चौथी शताब्दी ई. में गुप्त और ओलिकरों ने मालवा से शकों की शासन सत्ता समाप्त कर दी। शक और गुप्तों के काल में उज्जयिनी क्षेत्र का आर्थिक एंव औद्योगिक विकास हुआ। छठी से दसवीं सदी तक उज्जैन कलचुरियाँ, मैत्रकों, उत्तर गुप्तों, पुष्ठभूतियों, चालुक्यों, राष्ट्रकूटों व प्रतिहारों की राजनीतिक गतिविधियों का केन्द्र रहा।

अन्य राजवंशों का अधिकार : सातवीं शताब्दी में कन्नौज के राजा हर्षवर्धन ने उज्जयिनी को अपने साम्राज्य में मिला लिया। उसके समय में उज्जयिनी का सर्वागीण विकास हुआ। सन 648 ई. में हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद नवीं शताब्दी तक उज्जैन परमार शासकों के आधिपत्य में आया, जिनका शासन गयारहवीं शताब्दी तक चलता रहा। इस समय में उज्जैन की क्रमिक उन्नति होती रही। परमारों के बाद उज्जैन पर चौहान और तोमर राजपूतों ने अधिकारों कर लिया। सन 1000 से 1300 ई. तक मालवा पर परमार राजाओं का शासन रहा और बहुत समय तक परमार राजाओं की राजधानी उज्जैन रहीं। इस समय में सीयक द्वितीय, मुंजदेव, भोजदेव, उदयादित्य, नरवर्मन जैसे अनेक महान शासकों ने साहित्य, कला एवं संस्कृति की उन्नति में अपना समय लगाया।

दिल्ली सल्तनत : इसी समय दिल्ली के दास एवं खिलजी वंश के शासकों ने मालवा पर आक्रमण किया, जिससे परमार वंश का पतन हो गया। सन 1235 ई. में दिल्ली का शासन शमशुद्दीन इल्तमिश विदिशा पर विजय प्राप्त करके उज्जैन की और आया और उस क्रूर शासक ने उज्जैन को बहुत बुरी तरह लुटा और यहाँ के प्राचीन मंदिरों एवं पवित्र धार्मिक स्थानों का वैभव भी नष्ट कर दिया। सन 1406 में मालवा दिल्ली सल्तनत से आजाद हो गया। खिलजी व अफ़गान सुल्तान स्वतंत्र रूप से राज्य करते रहा। मुगल सम्राट अकबर ने जब मालवा को अपने अधिकार में लिया तो अकबर ने उज्जैन को प्रांतीय मुख्यालय बनाया। मुगल बादशाह अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ और औरंगजेब ने यहाँ शासन किया।

मराठों का अधिकार : सन 1737 ई. में उज्जैन पर सिंधिया वंश का अधिकार हो गया। सन 1880 ई. तक यहाँ सिंधिया शासकों का एकछत्र राज्य रहा, जिसमें उज्जैन का विकास होता रहा। सिंधिया शासकों की राजधानी उज्जैन बनी। महाराज राणोजी सिंधिया ने ‘महाकालेश्वर मंदिर‘ का जीर्णोद्धार कराया। सिंधिया वंश के संस्थापक शासक राज्य की राजधानी को ग्वालियर में ले आये, किन्तु उसके बाद भी उज्जैन का विकास होता रहा। 1948 में ग्वायिर को नवीन मध्य भारत में मिला लिया गया। आज भी उज्जयिनी में अनेक धार्मिक, पौराणिक एवं ऐतिहासिक मंदिर और भवन है, जिनमें भगवान महाकालेश्वर मंदिर, चौबीस खंभा देवी, गोपाल मंदिर, काल भैरव, बोहरों का रोजा, विक्रांत भैरव, चौसठ योगिनियां, नगर कोट की रानी, हरसिद्धि माँ का मंदिर, गढ़कालिका देवी का मंदिर, मंगलनाथ का मंदिर, सिद्धवट, बिना नींव की मस्जिद, गज लक्ष्मी मंदिर, बृहस्पति मंदिर, नवगृह मंदिर, भूखी माता, भृर्तहरि की गुफा, पीर मछन्दरनाथ की समाधि, कालिया दह पैलेस, कोठी महल, घंटाघर, जन्तर मंतर महल, चिन्तामन गणेश आदि प्रमुख रूप से उल्लेखनीय है।